जीवनी

प. पूज्य गुरुदेव का जीवन परिचय

श्री पंच अग्नि अखाड़े में महामण्डलेश्वर के रूप में शोभित श्री ईश्वरानन्द जी महाराज जो कि भारत भूमी में ध्यान योगी श्री उत्तम स्वामी जी के रूप में सनातन धर्म की अहर्नीश सेवा में उद्यत हैं।

पुजनीय, श्री उत्तम स्वामी जी का जन्म संतों की भुमी महाराष्ट्र अमरावती जिले में परमहंस मुंगसा जी महाराज के अनन्य भक्त श्री कीशनराव जी के पुत्र देवीदास व अर्धांगिनी श्रीमती कलावती देवी के वहाँ भाद्रपद माह की अष्टमी जन्माष्टमी पर कारन्जा के पास लोहगाँव में प्राकट्य हुआ।

परमहंस भगवान मूंगसा के कृपापात्र परीवार में प्राकट्य तथा दत्त अवतार श्री नरसीह दत्तात्रय भगवान, परमहंस श्री स्वामी समर्थ, परमहंस श्री गजानन महाराज से सुगंधित भूमी में संत अवतारी श्री उत्तम स्वामी जी महाराज बचपन से गृहत्याग करके जन्मानुकुल प्रवृत्त आत्म तत्त्व से परमात्म तत्व की शोध में प्रवृत्त हो गये।

बचपन जहाँ नाथ सम्प्रदाय के मठ में शांतीनाथ जी महाराज के सानिध्य में कठिन आश्रम व्यवस्था में संगीत, भगवत गीता, कथा का अध्ययन करते हुए गोल्ड मेडल प्राप्त किया किन्तु यह तो संत जन्म का पड़ाव मात्र था।

आश्रम से भी परमात्म तत्त्व की जीज्ञासा से 150 वर्ष के पुज्य संत परमहंस अखण्ड जपी श्री रामदास जी महाराज की गोद पुज्य गुरुवर को प्रदान हुई। गुरुदेव रामदास जी के एकमात्र शिष्य, पूज्य श्री ने 4 वर्ष दिगम्बरावस्था में अमराझीरी पर्वत पर नीम और बेल सेवन कर दिगम्बर साधना से कई देव एवं संत मिलन कर, गुरु शिष्य एकात्मता को प्राप्त किया। गुरु शिष्य एकाकार होकर जब गुरुदेव श्री रामदास जी ने सनातन सेवा का आदेश प्रदान किया तो स्वउत्थान के स्वार्थ को छोड़कर सनातन के शोषित वंचीत और धर्म के उत्थान और धर्म जागृती में प्रवृत्त हुए।

उत्तम सेवाधाम आश्रम :

  • जनामेडी – बांसवाड़ा (राजस्थान)
  • सप्त ऋषि मंडल के पास हरिद्वार (उत्तराखंड)
  • अलीराजपुर के विहंगम जंगल शूलपाणेश्वर (नर्मदा तट पर)
  • जबलपुर नर्मदा तट

इन विभिन्न स्थानों से :

  • हजारों बच्चों की शिक्षा
  • निरंतर लोगो के लिए भोजन व्यवस्था
  • स्वास्थ्य के लिए कार्य
  • सनातनियों की सुरक्षा
  • जीर्ण शीर्ण मंदीरों का पुनरुद्धार
  • विधर्मियों द्वारा किये जा रहे प्रयासों का खात्मा
  • विधर्मियों द्वारा किये जा रहे लवजीहाद, नशे की लत, धर्म परिवर्तन आदि का खात्मा करने का

जन्मगाथा

मुंगसाजी महाराज के बड़े ही अनन्य भक्त थे सानप परिवार के किशनराव सानप । जीवन में जब भी कठिन समस्या उपस्थित होती, वे मार्गदर्शन हेतु महाराज की शरण में पहुँच जाते। उनके सामने विकट समस्या तब खड़ी हुई जब उनके विवाह की बात चली। माता-पिता ने उनका विवाह निश्चित कर दिया था। प्रथा के अनुसार लड़कीवालों ने कन्यादान के बदले में बीस बोरे ज्वार की मांग रखी थी। घर में केवल बीस बोरे ज्वार थी। वह दे देने पर खाने तक के लिये कुछ नहीं बचता। उस पर लड़की भी मनपसंद की नहीं थी। अलोकाबाई नाम की जिस लड़की से विवाह तय किया गया था, वह दिखने में केवल काली ही नहीं थी, एक आँख में दृष्टि दोष भी था। परेशान किशनराव अपना दुख बताने मुंगसाजी महाराज की शरण में पहुँचे। अंतर्यामी मुंगसाजी ने इनके जाते ही कहा ‘मैंने ही तेरी शादी उस लड़की से तय की है। तू -भाग क्यों रहा है। इसी में तेरा कल्याण है।’ महाराज की इच्छा देख उन्होंने अलोकाबाई से विवाह किया। विवाह उनके लिये भाग्यशाली सिद्ध हुआ। खेती की जमीन आदि नहीं थी। खेतीहर मजदूर मात्र थे। विवाह के पश्चात् भाग्य उदय हुआ। स्वयं की खेती की जमीन हुई, घर धन-धान्य से परिपूर्ण रहा। इन्हीं किशनराव सानप के पुत्र देवीदास नाथ संप्रदाय के शांतिनाथ महाराज के शिष्य हैं। नाथ संप्रदायी शांतिनाथ महाराज का आश्रम लोहगाँव में भी है। देवीदास घर गृहस्थी के कामों से निवृत्त हो नित्यप्रति आश्रम में हाजिरी लगाते थे। देवीदास की धर्मपत्नी कलावतीबाई की कोख से तीन पुत्र उत्पन्न हुए १. मधुकर, २. अनिल और ३. गोवर्धन (उत्तम स्वामी)। यही उत्तम उत्तम स्वामी महाराज के नाम से जाने जाते हैं।

उत्तम स्वामीजी के जन्म के पूर्व से ही शुभ संकेत मिलने लगे थे। माता को स्वप्न में चतुर्भुजधारी देवता के दर्शन हुए। भगवान ने बताया कि मैं तुम्हारे घर में आने वाला हूँ। इसके बाद देवता बालक रूप में परिवर्तित हो गये। दूसरे दिन ऐसा ही स्वप्न पिता को भी आया। सरल हृदय देवीदास एवं कलावतीबाई ईश्वर के संकेत को सामान्य स्वप्न समझ भूल गये। एक आम निर्धन किसान की भांति सानप परिवार का मकान कच्चा था। मिट्टी की दीवारें थीं और छत कवेलु की थी। सामान के नाम पर गिनी चुनी वस्तुएं थीं। ईश्वर के प्रति श्रद्धा व परिवार के प्रति कर्तव्य भावना से सानप दंपत्ति दोनों बच्चों के साथ जीवन यापन कर रहे थे कि घर में तीसरी संतति आने के संकेत मिले। माँ कलावती गर्भ भार उठाये परिवार की सेवा सुश्रुषा में निरत थी।

वर्षा ऋतु प्रारंभ हो चुकी थी। कई दिनों से निरन्तर वर्षा हो रही थी। कवेलु की छत पानी रोक पाने में असमर्थ थी। मिट्टी का फर्श गीला हो चुका था। कहीं आना जाना कठिन था। कुछ भी हो प्रकृति का चक्र अबाध गति से चलता रहता है। ऐसे में कलावतीबाई को प्रसव वेदना होने लगी। गाँव में सुविधाओं का अभाव रहता ही है। कष्ट सहने और प्रतीक्षा करने के अतिरिक्त हाथ में कुछ होता नहीं है। दो दिन तक रह रह कर प्रसव पीड़ा होती रही। संतति जन्म के लक्षण दिखायी देने लगे तब दाई को बुलाया गया। इधर वर्षा ने जोर पकड़ा। कवेलु की आड़ की अवहेलना कर सब ओर से पानी टपकने लगा। छाते के सहारे वर्षा से बचाते हुए सायं ७.१० बजे दाई ने देवीदास सानप के तीसरे पुत्र को भूमिष्ठ किया। दिन था शुक्रवार और तिथि थी अष्टमी। कृष्ण जन्माष्टमी का शुभ पर्व था। स्वाभाविक था कि नवजात का नामकरण कृष्ण के नाम पर रखा जाता। अतः एव तीसरे पुत्र का नाम रखा गया गोवर्धन ।

पूत के पांव पलने में

बालक के जन्म के बाद अनेक चमत्कारी घटनाएं हुई। बालक अभी आठ माह का था। शाम का धुंधलका गहराने लगा था। माँ ने अपने दुलारे को पालने में लिटाया और किसी कार्य से बाहर गई। लौट कर देखा बालक आराम से सो रहा है। तभी फुफकार की आवाज सुनायी दी। घर में विद्युत व्यवस्था नहीं थी। लालटेन की रोशनी में देखा कि अजगर के समान एक विशालकाय सर्प फन फैलाये हुए झूले की रस्सी से लटका हुआ है। घबरायी माँ ने सहायता हेतु आवाज देकर पड़ोसियों को बुलाया। किसी को समझ में नहीं आ रहा था कि क्या किया जाये। सर्प को छेड़ने पर वह बच्चे को नुकसान पहुँचा सकता था। इस अवस्था में बालक को छोड़ा भी नहीं जा सकता था। समाचार पाकर देवीदास दौड़े दौड़े आये। किंकर्तव्यविमूढ पिता ने मुंगुसाजी महाराज का स्मरण कर पालने के पास अगरबत्ती जलाई। सर्प दो घण्टे तक पालने के पास रहा। फिर किसी को हानि पहुँचाये बिना अपने आप चला गया।

इस घटना से सब इतने भयभीत थे कि रात में घर में सोने की हिम्मत नहीं हो रही थी। अतः सोने के लिये पड़ोसी के घर गये। रात को बारह बजे सांप की फुफकार सुनायी देने लगी। उठ कर लालटेन का प्रकाश किया गया। सर्प पड़ौसी के घर भी पहुँच गया था। लालटेन की रोशनी की गई। देखते क्या है कि सर्प बालक के सिर के पास कुंडली मारे बैठा है। थोड़े समय पश्चात् सायंकाल की भांति अपनेआप चला गया।

बालक दिखने में अत्यन्त सुन्दर था। वामनमूर्ति, गोरा रंग, लुभावना मुखमंडल, मधुर वाणी सबको आकर्षित करती थी। नाम भले ही गोवर्धन रखा गया था, पर उसके गुणों को देख सब उसे उत्तम कहते थे। यही नाम प्रचलन में रहा और स्वामीजी बनने के बाद भी इसी नाम से जाने जाते हैं।

उत्तम पाँच वर्ष का था, उस समय का प्रसंग है। एक दिन मामा के साथ जंगल में बेर खाने के लिये गया। मामा-भांजे बेर खाने में मग्न थे कि किसी ने बर्र के छते में पत्थर दे मारा। फिर क्या था बर्र बालक पर टूट पड़ी। बर्र ने नखशिखान्त डंक मारे थे। बालक बेहोश हो चुका था। हतप्रभ मामा ने कहीं से टाट लाकर भांजे का शरीर ढका। फिर गाँव से परिजनों को बुला कर लाया। उसी अवस्था में घर लाया गया। चिकित्सक बुलाए गये। औषधि दी गई। शरीर से सारे डंक निकालने में तीन दिन लगे। बालक को अभी तक होश नहीं आया था। चिकित्सकों की समझ में नहीं आ रहा था कि क्या किया जाये। पाँच दिन बाद बालक की बेहोशी टूटी। पूत के पाँव पलने में दिखाई देने लगे थे। पढ़ने में होशियार था। मगर उसके खेल बालसुलभ प्रवृत्ति से अलग थे। किसी ने सिखाया नहीं था, फिर भी प्रातः काल उठ कर अगरबत्ती लेकर गाय की पूजा करता। स्कूल से आने के बाद बच्चों को जमा कर पत्थर एकत्र करता और उनसे हनुमान का मंदिर बनाता। भजन करता। छुट्टी के दिन यह खेल दिन भर चलता। सब अपने घर से रोटी लाते। पहले कथा की जाती, फिर एकत्रित रोटी को प्रसाद रूप में वितरित किया जाता। गाँव में विठ्ठल भगवान का मंदिर है। वहाँ नियमित रूप से हरिपाठ व कीर्तन होता था। कीर्तन में सम्मिलित होना उत्तम को प्रिय था। बचपन से झांझ अच्छी प्रकार बजाता था। अतः कीर्तनकार कौतुकवश उसे अपने साथ खड़ा कर लेते। भगवान की आरती उसे कंठस्थ थी। स्वर मधुर था। मग्न होकर आरती गाता।

उत्तम की स्मरण शक्ति अच्छी थी। कई श्लोक कंठस्थ कर लिये थे। सज्जन लोग उसे बुलाते और उससे श्लोक सुनते। उसमें एक विलक्षणता थी कि मुँह से वाणी निकलती थी वह पूर्ण हो जाती थी। इस विलक्षणता के कारण वह व्यसनी लोगों में भी लोकप्रिय था। जिन्हें सट्टा खेलने का व्यसन था, वे उससे सट्टे का नम्बर पूछते थे। उत्तम जो नम्बर बताता, वह अवश्य आता था। पिता ने नाथ संप्रदाय के महन्त शांतिनाथ महाराज से दीक्षा ली थी। अतः मठ में दर्शन के निमित्त जाते रहते थे। नन्हा उत्तम पिता की उँगली थाम साथ हो लेता। शांतिनाथ महाराज उससे विशेष स्नेह रखते थे। मठ के संन्यासियों के लंबे बाल और वेशभूषा को देख बालक उत्तम की धारणा बनी की ईश्वर का दर्शन करने के लिये संन्यासी होना पड़ता है। ईश्वर दर्शन की इच्छा उसके मन में भी थी। अतः मन ही मन संन्यासी बनने का निश्चय कर लिया। समय आने पर गाँव की पाठशाला में अपने मित्रों के साथ पढ़ने जाने लगा। विद्यालय के अध्यापक नारायण राव दामले सत्संग के निमित्त शांतिनाथ महाराज के मठ में जाया करते थे। उन्होंने देखा की नन्हा उत्तम नित्यप्रति मठ में आता है। बालपन से ईश्वर के प्रति भक्ति देख वे उससे स्नेह करते थे। दामले गुरुजी के स्नेहपूर्ण आत्मीय व्यवहार के कारण उत्तम मन की जिज्ञासा को उनसे निसंकोच पूछ लिया करता था। एक दिन उसने पूछा- ‘अध्यापकजी, क्या ईश्वर है? क्या ईश्वर दर्शन के लिये संन्यास लेना पड़ता है?’ छोटे से बच्चे के मुँह से ईश्वर दर्शन की बात सुन वे आवाक् रह गये।